धरती पर नदियां समुद्र पर्वतमालाएं झील या झरने का होना उसकी भौगोलिक पहचान है। उसी भौगोलिक पहचान के साथ दूसरे कुदरती मखलूक आबाद होते हैं। पूरी धरती पर पहाड़, बंजर रेगिस्तान की अपनी अपनी हैसियत है। यही उसकी भौगोलिक विविधता कही जाती है। साथ ही इस विविधता के मताबिक पेड पौधे जानवर और परिंदे भी होते हैं। इंसानी समाज इसी कदरती निजाम के बीच आबाद होता है। इसीलिए इंसान की समझदारी भी कदरत के निजाम और नियामत के मुताबिक होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि धरती के किसी भी हिस्से की आबादी वहां के बुनियादी भगोल वाली जमीन और पानी के मुताबिक होती है। इंसान की समझ कुदरत के तमाम मखलूकों से अलग है। इसमें एक अहम चीज है जिम्मेदारी। जिम्मेदारी धरती और दसरे मखलकों के साथ बनियादी समझ और उनकी हिफाजत के जज्बे से बनती है। धरती के किस हिस्से की क्या तासीर है और वहां की हिफाजत कैसे हो ये बात सीखने समझने में तमाम ज्ञान विज्ञान केन्द्र आबाद हुए। 'आज नदियों पहाड़, जंगल, जानवर, चिड़िया, परिदों को बचाने की बातें उठ रही हैं। हाल ही में अमेजन के जंगलों में आग लगी दुनिया के तमाम देशों में इस आग पर सवाल उठ रहे हैं। अमेजन के जंगल आकार में इतने बड़े हैं कि दक्षिणी अमेरिका के नौ देशों की सीमा इन जंगलों से लगती है। सात हजार किलोमीटर लम्बी अमेजन नदी का तटीय क्षेत्र इतने घने जंगलों से आबाद है। ये जंगल प्राकृतिक विविधता की अनूठी मिसाल है। किमिमा जिनके बारे में कहा जाता है कि इस दनिया को बीस प्रतिशत ऑक्सीजन इन्हीं जंगलों से मिलती है। आज विज्ञान की तरक्की की बदौलत नकली बारिश करवाने के तरीके ईजाद किये जा चके हैं। इसके बावजद विकास का पैमाना तय करते देशों को इन जंगलों की कोई परवाह नहीं। इसी तरह भारत के जंगलों में नये तरह की व्यावसायिक और पर्यटक गतिविधियां परवान चढी हैं।
इन गतिविधियों का सार्वजनिक उद्देश्य खाद्य और औषधियों को प्राप्त करने का है। लेकिन जिस तरह इन जंगलों का दोहन किया जा रहा है उससे तरक्की पसंद लोगों के इरादे टिकाऊ नहीं लगते हैं। ऐसे ही विकास कार्यों के चलते उन जंगलों की जिनकी आगोश में लोहा, ताम्बा, अभ्रक, बॉक्साइट, एल्यूमिनियम, सोना और हीरा मौजूद रहा, वहां की इंसानी जमातों और कुदरती मखलूकों की बरबादी को विकास करार दिया जाता रहा है। ऐसे विकास में जमीन पानी और कुदरती मखलूकों की बुनियादी आपसदारी बिगड़ रही है। इंसान का जमीन से सम्बन्ध कोई एक दो दिन महीने या साल की बात नहीं। ये आपसदारी बनने में सदियां गुजर जाती है। लम्बी मियाद गुजरती है तब आदमी का कुदरत के साथ रोजगार-कारोबार बनता है। इसी टिकाऊ सम्बन्ध के लिए पूरी धरती को एक मानकर इंसान का किरदार तय होता रहा। वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा तो इससे आगे बढ़कर पूरी धरती की आबादी को एक परिवार मानती है। जब भौगोलिक रूप से पूरी धरती को एक माना जाए तभी भावनात्मक रूप से पूरी धरती को परिवार मानना उचित हो सकता है। धरती को एक मानने वालों के सामने धरती पर मौजूद देशों और जमातों के खाँचे नाकाफी हो जाते हैं। जब मन की भावना से सम्बन्ध होता है तो दीवारें क्या कर सकती हैं। आज की राजनीतिक उठापटक में ऐसी व्यापक सोच गायब है जो पूरी दुनिया की इंसानियत के जख्मों पर मरहम पट्टी कर सके। कहते हैं किसी समय कश्मीर पूरी धरती के लिए ऐसे ज्ञान विज्ञान का केन्द्र रहा। दुनिया के ज्ञान विज्ञान के केन्द्र बिन्दु कश्मीर की स्थिति दुनिया के दिल जैसी मानी गई। जैसे दिल की इंसान के शरीर में भौतिक और आध्यात्मिक अहमियत है उसी तरह कश्मीर की अहमियत पूरी दुनिया में रही। आज भले ही कश्मीर की हालत बहुत अच्छी न हो मगर कश्मीर के ज्ञान विज्ञान की अहमियत कतई कम नहीं। उदाहरण के लिए अभिनव गप्त के नाट्यशास्त्रकाल लाजिर नाट्यशास्त्र को ले लीजिये। नाट्यशास्त्र पर ग्यारहवीं शताब्दी में लिखा ये साहित्य दुनिया भर के लिए क्या अहमियत रखता है, इसकी गवाही दुनिया भर के अस्सी से ज्यादा उन विश्वविद्यालयों से मिल जाती है। जहां अभिनव गुप्त और उनके साहित्य को पढ़ा और पढ़ाया जाता है। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दुनिया भर का हॉलीवुड-वॉलीवुड बनने में जो बुनियादी आधार है वह कश्मीर की विद्वत परम्परा की देन है।कश्मीर की विद्वत परम्परा की देन है।
इसी तरह संस्कृतियों और समाजों के जोड़ने के लिए एक से एक बेजोड़ साहित्य कश्मीर में रचे गये। साहित्य दृष्टि का निर्माण करता है। जहां दृष्टि होती है वहां भावना भी होती है जहां न भावना होती है वहीं मन लगा रहे तो वह दृष्टि सार्थक हो सकती है। है। आज स्थिति ये है कि भावना के आधार पर लोग दुनिया की एकता ता चाहतह लाकन एक व्य एकता तो चाहते हैं लेकिन एक व्यापक दृष्टि का अभाव है। ऐसे में सहमना और रचनात्मक समाज कैसे बचा रह पायेगा। यथा दृष्टि ततो भावः यतो भावः ततो मनः का उद्घोष मानवता के लिए कितना विलक्षण है। हम आशा करते हैं कि ऐसी व्यापक विश्व दृष्टि का निर्माण हो सके तो कश्मीरियत की रौनक, इंसानियत को एक नये मुकाम पर पहुंचा सकती है। इसी दृष्टि से देश और समाज के भय और भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकती है। पूंजी की बेलगाम पाशविक प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाने के लिए कश्मीरियत की सार्वभौमिक प्रतिष्ठा बहत कारगर हो सकती है। यही हमारे नैतिक मूल्यों का आधार रहा है यही हमारी और सारी दुनिया की नैसर्गिक आजादी की अनिवार्य जरूरत है। ऐसे मूल्यों को हमारी शिक्षा नीति में शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन राष्ट्रवादी दावेदारों ने अभी तक गंभीरता नहीं दिखाई है। आज की सारी बहस महज 370 के अंको पर सिमट रही है। जम्हूरियत का भी कोई वाजिब ख्याल नहीं किया जा सका है। बताते हैं कि कश्मीर में इस्लाम ही नहीं यहूदी और ईसाइयत भी लम्बे समय से मौजूद रही है लेकिन ये साफ नहीं किया जा सका है कि अगर वैश्विक समुदाय अपनी मजहबी मान्यताओं की दुहाई देकर कश्मीर में किसी दखल की मांग करता है तो सरकार का रवैया क्या होगा? विकास की आधनिक अवधारणा के विद्वानों ने जो इशारा दिया है शायद उसे गंभीरता से समझने की जरूरत है जो कहता है कि 'डेवलपमेंट इज द इंटरमिशन इन एक्जिस्टिंग स्ट्रक्चर'। एफडीआई की बदौलत कश्मीर के विकास का अरमान सजाए हमारे हक्मरान इसका आकलन कितनी गंभीरता से करते हैं। कश्मीर दनिया का दिल है इस दिल की बात हर दिल में नेकी का सबब साबित हो।
- सं. कुलदीप सक्सेना